जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि | Best Nirankari Vichar Satguru Mata Sudiksha Ji 2024

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जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि : सामने वाला हमें वैसा ही नजर आएगा, जैसे हमने उसके प्रति अपनी धारणा बना ली है।

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि NirankariSatsangLive
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 जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि | As is the Vision, so is the Creation

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि : सामने वाला हमें वैसा ही नजर आएगा, जैसे हमने उसके प्रति अपनी धारणा बना ली है। हम सभी अपना नज़रिया ऐसा बनाएं जैसे कि हम सृष्टि को देखना चाहते हैं। सौन्दर्य तो दर्शक की आँखों में होता है इसलिए अगर हम अपनी दृष्टि सुंदर रखेंगे तो हमें सृष्टि भी सुंदर लगेगी। किसी की तो तमाम खामियों के बावजूद हम उसे बहुत प्यार से के देखते हैं, जबकि किसी की तमाम खूबियाँ भूलकर, एक खामी की वजह से हम उस इन्सान को अपने मन से उतार देते हैं और उससे बात करना छोड़ देते हैं। इसलिए हम सभी को खुद को स्थिर रखने की आवश्यकता है। यह विचार सद्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने श्रद्धालु भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि | Niirankari Vichar Satguru Mata Ji

अक्सर हमारी आँखों में ही गलती होती है-जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि | Our Eyes are Often at Fault

अक्सर हमारी आँखों में ही गलती होती है यानि कि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, बेशक हमारी नीयत ठीक हो। उदाहरण के तौर पर जिस बुजुर्ग इंसान को हमने सड़क पार करा दी, बाद में पता चला कि उसे इसकी जरूरत नहीं थी। चूक हो गई क्योंकि सामने वाले की जरूरत को बिना समझे हमने निर्णय ले लिया।

हमने परछाई को ही हकीकत बना दिया-जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि | We Turned the Shadow into Reality

एक और उदाहरण भी हमने सुना है कि हम बार-बार एक चीज को पानी में से निकालने की कोशिश कर रहे हैं। फिर भी हम उसे पानी से निकाल नहीं पा रहे क्योंकि कोई वह कीमती चीज तो दरअसल पेड़ पर टंगी है और उसकी परछाई ही पानी में दिखाई दे रही है। हमने परछाई को ही हकीकत बना दिया।

ऐसा भी होता है कि हमने किसी कमरे में प्रवेश किया और वहाँ दो व्यक्तियों के बीच पहले से ही कोई वार्तालाप चल रहा है। हमने पीछे की बात सुनी नहीं और सामने वाले के प्रति हम अपनी एक धारणा बना कर बैठ जाते हैं। बहुत बार जो दिखाई देता है, सुनाई देता है वह सही नहीं होता। जब हमने परमात्मा को मन में बसा लिया, अपने हर ख्याल में बसा लिया तो हमें संदेह का लाभ किसी और को देना आ जाए, बेशक गलती किसी से भी हुई हो।

किसी का स्वभाव कैसा भी हो, हम यह मानें कि हमारा नज़रिया ही ठीक नहीं। किसी को देखकर कई बार लगता है कि यह व्यक्ति कुछ अजीब-सा है। उसके पीछे भी कोई कारण तो रहा होगा। हो सकता है. उसको कुछ अच्छे अनुभव ना हुए हों और हालात की वजह से उसके अंदर कड़वापन आ गया हो।

अपने नजरिए में जब हम निरंकार को बसा लेते हैं फिर हमें हर चीज पावन व पुनीत दिखती है जैसा निरंकार ने उसे मूल रूप से बनाया है। इन्सान के शरीर द्वारा गलतियां होने पर भी रूह तो निरंकार का अंश है।

इस शरीर पर माया का असर होता है क्योंकि मानवीय अनुभव शरीर से होता है। निरंकार को याद रखने से माया का रंग भी अपने आप उतरता चला जाता है और शरीर में रहते हुए, परमात्मा से इकमिक हो कर जीना संभव हो जाता है।

What is true religion
What is true religion

सच्चा धर्म क्या है ?

सबसे बड़ा और सच्चा धर्म मानवता का है (इंसानियत का धर्म सबसे सच्चा धर्म है।

जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि से क्या तात्पर्य है ?

सामने वाला हमें वैसा ही नजर आएगा, जैसे हमने उसके प्रति अपनी धारणा बना ली है।

उदाहरण के तौर पर : जिस बुजुर्ग इंसान को हमने सड़क पार करा दी, बाद में पता चला कि उसे इसकी जरूरत नहीं थी

चूक हो गई क्योंकि सामने वाले की जरूरत को बिना समझे हमने निर्णय ले लिया।

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